Somwati Amavasya katha : सोमवती अमावस्या कथा

Somwati Amavasya katha : सोमवती अमावस्या कथा

एक बार की बात है, एक छोटे से गांव में सोमवती अमावस्या के व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता था। गांव के सभी लोग इसे धार्मिक भाव से मनाते थे। इस व्रत के दिन ग्रामीण लोग अन्न और जल अर्पित किया करते थे और पूजा-अर्चना करते थे।

उसी गांव में एक गरीब लड़की रहती थी जिसका नाम सोना था। सोना बहुत ही समझदार और धार्मिक बालिका थी। उसने सोमवती अमावस्या का व्रत भी रखने का निर्णय लिया। वह इस व्रत को ध्यान से मानती थी और उसे सच्ची भावना के साथ पूजा अर्चना किया करती थी।

जब वह व्रत की पूजा करने के लिए अपने घर की ओर जा रही थी, तभी उसे एक बूढ़ी औरत मिली। बूढ़ी औरत के हाथों में भारी सामान का एक झोला था। सोना ने उसे पूछा, “आपको कौन सा सामान ले जाना है दादी माँ?” बूढ़ी औरत ने कहा, “बेटा, मुझे अपने पुराने और कुछ जरूरी सामान लेकर गंगा जी में विसर्जित करना है। क्या तुम मेरी मदद करोगी?”

Somwati Amavasya katha : सोमवती अमावस्या कथा

सोना ने उस बूढ़ी औरत की मदद करने का निर्णय लिया और उसके साथ चलने को राजी हो गई। रास्ते में, बूढ़ी औरत ने सोना को अपनी ज़िन्दगी की कठिनाइयों के बारे में बताया और उसकी सहंसिलता और धैर्य की सराहना की। सोना ने बूढ़ी औरत से कई बातें सीखीं और बहुत प्रभावित हुईं।

वह गंगा घाट पहुंचकर सामान को गंगा जी में विसर्जित करने के बाद, सोना ने उस बूढ़ी औरत से कहा, “दादी माँ, धन्यवाद कि आपने मुझे अपनी कठिनाइयों के बारे में बताया और मुझे अपनी सहंसिलता की प्रेरणा दी। मैं आपके आशीर्वाद के बिना इसे पूरा नहीं कर पाती।”

बूढ़ी औरत ने सोना को आशीर्वाद दिया और कहा, “बेटा, तूने इस व्रत को सच्ची भावना के साथ निभाया है और दूसरों की सहायता की है। ईश्वर तुझे सदैव खुश रखेगा और तेरी सभी मनोकामनाएं पूरी करेगा।”

उस दिन से आगे, सोना ने धैर्य और सामर्थ्य के साथ अपनी ज़िन्दगी चलाई और अपनी सभी मनोकामनाएं प्राप्त की। यह एक सोमवती अमावस्या की कथा है जो हमें यह सिखाती है कि सच्ची भावना और दूसरों की सहायता से हम सभी मनोकामनाएं प्राप्त कर सकते हैं।

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